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مدھیہ پردیش ہائی کورٹ کے حکم کے بعد دھار کی کمال مولا مسجد کا ہوگا سائنٹفک سروے - Roznama Sahara اردو
مدھیہ پردیش ہائی کورٹ کے حکم کے بعد دھار کی کمال مولا مسجد کا ہوگا سائنٹفک سروے - Roznama Sahara اردو : اندور (ایجنسیاں): وارانسی میں واقع گ...
Thursday, March 21, 2024
مدھیہ پردیش ہائی کورٹ کے حکم کے بعد دھار کی کمال مولا مسجد کا ہوگا سائنٹفک سروے - Roznama Sahara اردو
Thursday, March 7, 2024
Monday, July 24, 2023
पियारे नबी की पियारी शान
प्यारे नबी की प्यारी शान
अगर आप को नबी से मुहब्बत है तो आप यह याद कर लें
*किताब का नाम :-खसाईसुन्नबी (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम)*
*लेखक का नाम* *मदीने का भिकारी अहक़रूल कादरी अबुस्सालेह
मुहम्मद फ़ैज़ अहमद अवेसी रज़वी गफरलाहू
भावलपूर -पाकिस्तान*
*उर्दू से हिंदी*
*मुहम्मद अब्दुर रहीम खान क़ादरी रज़वी
*किताब का हिन्दी नाम :-
प्यारे नबी की प्यारी शान*
पेशे लफ्ज़
अलहमदुलिल्लाहि रब्बिल आलमीन.अस्सलातु वस्सलामु अला सय्यिदिल मुरसलीन
दौरे हाजेरह में रसूले अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शाने अक़दस पर मुख्तलिफ़ हीलों से हमले हो रहे हैं-इस्लाम के नाम पर जमाअतें बना कर आप के कमालात और फ़ज़ाइल को शिर्क बताया जाता है-जो मुसलमान रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के यह खसाईसे मुबारका ज़बानी याद करलेगा वह न सिर्फ गुमराही से बच जाएगा.बल्कि दुनिया व आखि़रत में फलाह व कामरानी से हम्किनार होगा
फ़क़ीर का मशवरा है कि यह खसाईस न सिर्फ खुद बल्कि घर का तमाम कुमबा बच्चे.बच्चियाँ.मर्द.औरतें ज़बानी याद कर लें और मदारिसे इस्लामिया बिल खुसूस अहले सुन्नत के हर तालिबे इल्म को ज़बानी याद करायें बल्कि इब्तिदाई निसाब में शामिल फरमाएं.और इसी तरह रोज़ाना बच्चों से तकरार कराएं जैसे इस्कूलों में पहाड़े पढ़ाए जाते हैं
फ़क़त वस्सलाम
मदीने का भिकारी अहक़रूल कादरी अबुस्सालेह
मुहम्मद फ़ैज़ अहमद अवेसी रज़वी गफरलाहू
भावलपूर -पाकिस्तान
बिस्मिल्लहिर्र्रह्मानिर्रहीम
नहमदूहू व नुसल्ली अला रसूलिहिल करीम
मुकद्दमा
हबीबे खुदा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के खसाईस याद करना दोनों जहानों में फलाह का मुअज्जिब है वह यह है
खसाईस की चार किस्म
1:-वह वाजिबात जो आंहज़रत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से खास हैं मसलन नमाज़े तहज्जुद
2:- वह अहकाम जो आंहज़रत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ही पर हराम है .दूसरों पर नहीं.मसलन तहरीमे ज़कात
03:- वह मबाहात जो आंहज़रत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से खास हैं मसलन नमाज़ बादे असर
04:- वह फ़ज़ाइल वह करामात जो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से मख्सूस हैं।
इस रिसाला में क़िस्मे चहारूम में चंद यह हैं
यक सद (100) खसाईस यानी खुसूसियतें
01:-अल्लाह तआला ने हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को तमाम नबिय्यों से पहले पैदा किया है और सब से अखीर में आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को मबऊस फरमाया -
02:- आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और तमाम अंबियाए किराम अलैहिमुस्सलाम पैदाइशी नबी हैं दिगर अंबियाए किराम अला नबिय्यिना व अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम की अरवाह ने आप की रूहे अनवर से इस्तेफाज़ा किया
03:- आलमे अरवाह में दीगर अंबिया ए किराम अलैहिमुस्सलाम की अरवाह से अल्लाह तआला ने अहद लिया कि अगर वह हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के ज़माने को पाएं तो आप पर ईमान लायें और आप की मदद करें
04:- यौम "अल्सत" में सब से पहले हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने •बला •कहा था
05:- हज़रत आदम अला नबिय्यिना व अलैहिस्सलातू वस्सलाम और तमाम मखलूक़ात हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही के पैदा किये गए
06:- हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इस्म मुबारक अर्श के पाया पर और हर एक आसमान पर और बहिश्त के दरख्तों और महलात पर और हूरों के सीनों पर और फरिश्तों की आंखों के दरमियान लिखा गया है
07:-साबिक़ा आसमानी कुतुब तौरात व इंजील वगैरह में आप की बशारत है
08:- हुजूर अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की विलादत शरीफ के वक़्त बूट औंधै गिर पड़े.जिन्नात ने अशआर पढ़े -
09:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम खतना किये हुए.नाफ बरीदा और आलूदगी से पाक व साफ पैदा हुए
10:- पैदाइश के वक़्त आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि
वसल्लम हालते सजदा में थे और हर दो अँगुश्ते शहादत आसमान की तरफ उठाए हुए थे
11:-आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ पैदाइश के वक़्त ऐसा नूर निकला कि इस में आप की वालिदा माज्दा ने मुल्के शाम के महल देख लिये
12:- हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के गहवारह को फ़रिश्ते हिलाया करते थे.आप ने गहवारह में गुफ्तगू की
चाँद से आप की गुफ्तगू मशहूर है बल्कि आप जिस सिम्त को इशारा फरमाते वह आप की तरफ झुक जाता
13:- अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद में हुजूर सरवरे सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के हर अज़व (अंग) का इलाहेदा ईलाहिदा ज़िक्र फरमाया है जिसे तफसील से फ़कीर अवेसी ग़फ़रलाहू ने शरह हदाइक़े बख्शिश में लिख दिया
14:- हुजूर सरवरे सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इसमे मुबारक (मुहम्मद) अल्लाह तआला के इसमे मुबारक (महमूद) से मुश्तक है
15:-हुजूर सरवरे सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के अस्माए मुबारका में से तक़रीबन (सत्तर) नाम वही हैं जो अल्लाह अल्लाह तआला के हैं p
16:- हुजूर अक्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का एक इस्मे मुबारक अहमद है.आप से पहले जब से दुनिया बनी है किसी का यह नाम न था-ताकि इस बात में किसी को शक न रहे कि कुतुबे साबिक़ा में जो अहमद मज़कूर है वह आप ही है
17:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को खुद अल्लाह तआला खिलाता पिलाता था जन्नत के खानों से
18:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पीछे से ऐसे देखते थे जैसे आगे को देखते- रात को तारीकी में ऐसे देखते जैसे दिन के वक़्त और रोशनी में देखते थे
19:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का लुआबे दहन (थूक ) शोर (खारे) पानी को मीठा बना देता और शीर ख्व़ार बच्चों के लिये दूध का काम देता
20:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जब पत्थर पर चलते तो उस पर आप के क़दम मुबारक का निशान हो जाता
21:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की आवाज़ मुबारका इतनी दूर तक पहोंचती कि किसी दूसरे की न पहोंचती-चुनांचे जब आप खुतबा दिया करते थे तो ख्वातीन अपने घरों में सुन लिया करती थीं
22:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बग़ले अक्दस पाक व साफ और खुशबूदार थी
23:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की कुव्वते सामिअह (सुनने की ताक़त) सब से बढ़ कर थी.यहाँ तक की आसमान में मलाईका की कसरते अज़दहाम के बावजूद आसमान की आवाज़ सुन लेते थे.जिब्ररईल अलैहिस्सलाम की खुशबू भी सूंघ लेते बल्कि आसमानों के दरवाजों के खुलने की आवाज़ भी सुन लेते (इसी लिये अहले सुन्नत का अक़ीदा है कि सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम दरूद शरीफ खुद सुनते हैं और जो उम्मती भी फ़रयाद करता है आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम वह भी सुनते हैं
24:- नींद में आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की आँख सो जाती है लेकिन दिल पाक बेदार रहता है
25:-आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने कभी अंगड़ाई और जमाई (ओबाशी) नहीं ली
26:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का साया न था कियोँकि आप नूर ही नूर थे और नूर का साया नहीं था
27:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के बदन शरीफ पर मक्खी न बैठती और कपड़ों में जूं न पड़ती -
28:- जब आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम चलते तो फ़रिश्ते (बिगरज़े हिफाज़त) आप के पीछे होते- इसी वास्ते आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने असहाबे किराम से फरमाया कि तुम मेरे आगे चलो और मेरी पीठ फरिश्तों के वास्ते छोड़ दो
29:-हुजूर अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का खून और तमाम फ़ूज़लात पाक थे बल्कि आप के बोल का पीना शिफ़ाए अमराज़ था
30:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का पसीना अक़दस कस्तूरी से ज़्यादा खुशबूदार था
31:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम दरमियाना क़द वाले मायल ब दराज़ी थे जब चलते तो सब से ऊँचे नज़र आते ताकि जाहिरी तौर पर आप से कोई ऊंचा न हो.
32:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जिस गंजे के सिर पर हाथ अक़दस फेरते उसी वक़्त गंजे के बाल उग आते और जिस दरख़्त को बोते वह उसी साल फल देने लगता जैसे हज़रत सलमान फारसी रदियल्लाहु अन्हु का बाग़
33:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जिस के सर पर हाथ फेरते आप की हाथ जगह के बाल सियाह (काले) रहते सफेद नहीं होते
34:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बअषत पर काहिनों की खबरें मुनक़तअ हो गईं और शहाबे शाकिब के साथ आसमानों की हिफाज़त कर दी गई और शयातीन तमाम आसमानों से रोक दिये गये
35:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का क़रीन व मुअक्किल (जिन)इस्लाम ले आया
36:- शबे मेअराज में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लिये बुराक़ मअ जैन व लगाम आया
37:- हुजूर अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम शबे मेराज मे जसदे मुबारक के साथ हालते बेदारी में आसमानों से ऊपर तशरीफ ले गए
38:-आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने परवर दिगार जल्ला शानुहू को अपनी सर की आँखों से देखा और उस के साथ कलाम किया .उसी रात आप बैतूल मुकद्दस में नमाज़ में दिगर अंबिया ए किराम अलैहिमुस्सलाम और फरिश्तों के इमाम बने
39 :- बअज़ ग़ज़वात में फ़रिश्ते आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ हो कर दुश्मनों से लड़े -जैसे बद्र में
40:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अल्लाह तआला ने वह किताब अता फरमाई जो तहरीफ से महफ़ूज़ और बलिहाज़ लफ्ज़ व माना मुअजिज़ा है
41:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम रात में तबस्सुम फरमाते तो घर रोशन हो जाता
42:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के जिस्मे अक़दस से खुशबू आती आप जिस रास्ता से गुज़रते उस से खुशबू महकती रहती
43:- जिस सवारी पर आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम सवार होते वह बोल व बराज़ न करता जब तक आप सवार रहते
44:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ज़मीन के खज़ानों की कुंजियाँ अता की गईं - इन खज़ानों में से जो कुछ किसी को मिलता है- वह आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दस्ते मुबारक से मिलता है कियोँकि आप बारी तआला के खलीफए मोतलक़ व नाईबे कुल हैं- जो कुछ चाहते हैं बिइज़ने इलाही अता फरमाते हैं
45:- अल्लाह तआला ने आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को हर शै का इल्म दिया यहाँ तक कि रूह और उन ऊमूरे खम्सा का इल्म भी इनायत फरमाया जो सूरह लुक़मान के अखीर में ज़िक्र है
46:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम सारे जहाँ (जिन्न व इन्स. मलाइक) के लिये रहमत बनाकर भेजे गए हैं तफसील देखिये फकीर का रिसाला कुल कायनात का नबी
47:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम सारे जहाँ के लिये रहमत बना कर भेजे गये हैं
48:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के रुअब का यह हाल था कि दुश्मन ख्वाह एक माह की मुसाफत पर होता आप पर रुअब से फतह पाते और मग़लूब हो जाता
49:-आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लिये और आप की उम्मत के लिये तमाम रूए ज़मीन सजदा गाह और पाक करने वाली बना दी गई - जहाँ नमाज़ का वक़्त आजाये और पानी न मिले तयम्मुम कर के वहीं नमाज़ पढ़ ली जाए - दूसरी उम्मतों के लिये पानी के सिवा किसी और चीज़ के साथ तहारत न थी और नमाज़ भी मुअय्यन जगह के सिवा और जगह जायज़ न थी
50:- चाँद का टुकड़े होना. शजर व हजर(पेड़ व पत्थर) का सलाम करना और रिसालत की शहादत देना- सूतूने हन्नाना का रोना और उंगलियों से पानी के चश्मे की तरह जारी होना -यह सब मुअजिज़ात आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अता हुए
51:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम खातमुन्नबिय्यीन हैं .आप के बाद कोई नबी न आएगा
52:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शरीअत तमाम अंबिया ए साबिकीन की शरीअतों की नासेख है और क़यामत तक रहेगी
53:हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अल्लाह तआला ने अलक़ाब से खिताब फरमाया- बखिलाफे दिगर अम्बियाए के कि उन्हें उन के नाम से खिताब किया है उस पर आयाते कुरआनी शाहिद है
54:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को नाम मुबारक के साथ खिताब करने से अल्लाह तआला ने मना फरमाया
55:-अल्लाह तआला ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का ज़िक्र बुलंद किया है चुनांचे अज़ान और खुतबे और तशहहुद में अल्लाह अज्ज़ा वजल्ल के साथ आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का ज़िक्र भी है
56:-हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर आप की उम्मत पेश की गई और जो कुछ आप की उम्मत में क़यामत तक होने वाला है।वह सब आप पर पेश किया गया बल्कि उम्मतें भी आप पर पेश की गईं जैसा कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को हर चीज़ का नाम बताया गया
57:- आंहज़रत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अल्लाह तआला के हबीब हैं
58:- जो कुछ अल्लाह तआला ने पहले नबिय्यों को उन के मांगने के बाद अता फरमाया वह आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को बिना मांगे इनायत फरमाया
59:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का नाम मुबारक अल्लाह तआला ने अपनी किताब में ताअत वw मअसियत.फराईज़ व अहकाम.वअदा व वईद और इनआम व इकराम का ज़िक्र करते वक़्त अपने पाक नाम के साथ याद फरमाया है
60:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अर्श ता फर्श मशहूर हैं और नमाज़ व खुतबा व अज़ान में अल्लाह के नाम मुबारक के साथ आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का नाम मुबारक मज़कूर है और अर्श पर . कुसूर पर.हूरों के सीने पर.दरख्ताने बहिश्त के पत्तों पर और फरिश्तों की चश्म व अबरो पर आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इस्म शरीफ लिखा हुआ है और आप से पहले जिस क़द्र अंबिया ए गुज़रे हैं वह सब आप के सना ख्वाँ रहे हैं और क़यामत को सना ख्वाँ होंगे
61:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से वही की तमाम किस्मों के साथ कलाम किया गया
62:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का रोया (ख्वाब) वही है.यही हाल तमाम पैगम्बरों का है (अला नबिय्यिना अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम )
63:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर हज़रत ईसराफील अलैहिस्सलाम नाज़िल हुए जो आप से पहले किसी और नबी पर नाज़िल हुए
64:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम बेहतरीन औलादे आदम हैं
65:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अल्लाह तआला के नज़दीक अकरमुल खलक़ हैं इस लिये दिगर अंबिया व मुरसलीन और मलाइक से अफ़ज़ल हैं
66:- आप से तबलीगी अहकामात में खता व निस्यान मुहाल है
67:- क़ब्र में मय्यत से हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की निस्बत सवाल होता है
68:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के बाद आप की अज़वाजे मुतह्हरात से निकाह हराम किया गया है
69:- जिस ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ख्वाब में देखा उस ने बेशक आप ही को देखा.कियोँकि शैतान आप सूरत शरीफ की तरह नहीं बन सकता .इस बात पर तमाम मुहद्दिसीन का इत्तिफाक है कि जिस सूरत से किसी ने आप को ख्वाब में देखा उस ने आप ही को देखा
70:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इस्म शरीफ यानी "मुहम्मद" किसी का नाम रखना मुबारका और दुनिया और आखि़रत में उस के बेशुमार फायदे हैं तफसील के लिये देखिये फ़कीर की किताब शहद से मीठा नामे मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम
71:- किसी के जायज़ नहीं कि अपनी अंगूठी पर "मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह" नक्श कराए जैसा कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की अंगूठी पर था
सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम
72:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की हदीस शरीफ .के पढ़ने के लिये ग़ुस्ल व वजू और खुशबू मलना मूस्तहब है और यह भी मुस्तहब है कि हदीस शरीफ के पढ़ने में आवाज़ धीमी की जाए.जैसा कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की हयात शरीफ में जिस वक़्त आप कलाम करते हुक्मे इलाही था कि आप की आवाज़ पर अपनी आवाज़ को बुलंद न करो - आप के विसाल के बाद आप का कलाम मरवी व मासूर. इज़्ज़त व रिफअत में मिसल उस कलाम के है जो आप की ज़बान से सुना जाता था लिहाज़ा कलाम मासूर की क़िरात के वक़्त भी वही अदब मल्हूज़ रखना चाहिए और यह भी मुस्तहब है कि हदीस शरीफ ऊँची पर पढ़ी जाए और पढ़ते वक़्त किसी की ताजीम के लिये ख्वाह कैसा ही ज़ी शान हो खड़ा न होवे कियोँकि यह अदब के खिलाफ है
73:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की हदीस शरीफ के मुहद्दिसीन के चहरे ताज़ा व शादमाँ रहेंगे
74:- जिस शख्स ने बहालते ईमान एक लम्हा या एक नज़र हुजूरे अक़दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को आप की हयाते ज़ाहिरी में देख लिया उसे सहाबी होने का शरफ़ हासिल हो गया -तवील सोहबत शर्त नहीं -हाँ ताबिई होने के लिये यह शर्त है कि वह सहाबी की सोहबत में देर तक रहा हो
75:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के तमाम सहाबा किराम रदियल्लाहु तआला अन्हुम आदिल हैं -कियोँकि शहादत व रवायत में इन में से किसी की अदालत से बहस न की जाए +जैसा कि दिगर रावियों में की जाती है कियोँकि सहाबा ए किराम अलैहिमुर्रिज्वान की तअदील किताब व सुन्नत के कवी दलाइल से साबित है
76:- नमाज़ी तशहहुद में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से यूँ खिताब करता है :अस्सलामु अलैका अय्युहन्नबिय्यु (आप पर सलाम ऐ नबी ) और आप के सिवा किसी और मखलूक़ को इस तरह खिताब नहीं करता -शबे मेराज में अल्लाह तआला ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इन्हीं अल्फ़ाज़ से खिताब किया था -फोक़हा ए किराम लिखते हैं कि नमाज़ी को चाहिए कि।तशहहुद में शबे मेराज के वाकिया की हिकायत व अखबार का इरादा न करे बल्कि इन शा का कसद करे कि गोया वह अपनी तरफ से अपने नबी पर सलाम भेजता है
77:- हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की अज़वाजे मुतह्हरात रदियल्लाहु अन्हुन्ना के हुजरों के बाहर से आप को पुकारना हराम है
78:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से बुलंद आवाज़ से कलाम (बात) करना हराम है जैसा कि कुरआन मजीद में मज़कूर है
79:- आंहज़रत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मअसूम हैं गुनाहे सगीरा और कबीरा से अमदन (जान बूझ कर) और सहवन (भूल कर): एलाने नबुव्वत से कबल भी और बाद भी यही मज़हब मुख्तार है
80:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर जुनून और लम्बी बे होशी तारी नहीं हुई -कियोँकि यह मिनजुमला नक़ाईस हैं .अल्लामा सुबकी ने कहा कि पैगम्बरों पर ना बीनाई वारिद नहीं होती कियोँकि यह नुक्स है कोई पैगम्बर नाबीना नहीं हुआ -हज़रत शुएब अलैहिस्सलाम की निस्बत जो कहा गया कि वह नाबीना थे सो वह साबित नहीं -हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम सो उन की आँखों पर परदा आगया था और वह परदा दूर हो गया
मशहूर यह है कि कोई पैगम्बर (बहरा) न था -इस मसअले की वज़ाहत फ़कीर के रिसाला अनारतुल कुलूब फी बसारति याकूब में है
81:-जो शख्स हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को सब व शितम करे या किसी वजह से सराहतन या कनायतन आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की तनक़ीसे शान करे.उस का क़त्ल करना बिलइत्तिफाक़ वाजिब है मगर इस में इख्तिलाफ है कि यह क़त्ल करना ब तरीक़े हद है कि बिल फेअल मार डालना चाहिए और तौबा न करानी चाहिए .या ब तरीक़े इरतेदाद है कि उस से तौबा तलब की जाए-अगर तौबा करे तो बख्शिश देना चाहिए
इस मसअले में मुख्तारे क़ौले अव्वल है यह हुक्म इस सूरत में है कि अहानत करने वाला मुसलमान था अगर काफिर हो और इस्लाम लाए तो दर गुज़र करना चाहिए (दौरे हाज़ेरा में इस मसले पर अमल ज़रूरी है )
82:- अगर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम बनफ्से नफीस जिहाद के लिये निकलें तो हर मुसलमान पर वाजिब था कि आप के साथ निकले -और अगर कोई ज़ालिम आप के क़त्ल का क़सद करे तो जो मुसलमान हाज़िर हो उस पर वाजिब था कि आप की हिफाज़त में अपनी जान से दरेग़ न करे
83:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जिस शख्स के लिये जिस हुक्म की तख्सीस चाहते कर देते इस मसअले की तहक़ीक़ व दलाइल के लिये इमाम अहमद रज़ा मुहद्दिस बरैलवी व मुजद्दिदे बरहक़ रहमतुल्लाह अलैहि की तस्नीफ मुबारका कमनियातुल बीब का मुतालआ फरमाईए
84:- विसाले ज़ाहिरी से कबले मर्ज़ में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की इयादत के लिये हज़रत जिब्राइल अलैहिस्सलाम तीन दिन हाज़िरे खिदमत होते रहे
85:- जब मलकुल मौत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम खिदमत में हाज़िर हुए तो इज़ने तलब किया - आप से पहले उस ने किसी नबी से इज़न तलब होते रहे
86:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के जनाज़ा शरीफ की नमाज़ मुसलमानों ने गिरोह बा गिरोह अलग अलग बग़ैर इमामत के पढ़ी -आप के ग़ुलाम षक़रान ने जसदे मुबारक के नीचे लहद में क़तीफा नजरानिया बिछा दी जो आप ओढ़ा करते थे -नमाज़ बे जमाअत और क़तीफा का बिछाना आप के खसाईस से है
87:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के जिस्म मुकद्दस को मिट्टी नहीं खाती - तमाम पैगम्बरों का यही हाल है (अला नबिय्यिना अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम )
88:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बतौर मीरास कुछ नहीं छोड़ा - जो कुछ आप ने छोड़ा वह सदक़ा व वक्फ था.और उस का मसरफ वही था जो आप की हयात शरीफ में था
89:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपने मरक़द शरीफ में हयाते हकीका के साथ जिंदा हैं और अज़ान व इक़ामत के साथ नमाज़ पढ़ते हैं - तमाम पैगम्बरों का यही हाल है (अला नबिय्यिना अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम )
90:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का रौज़ा मुबारक कअबा मुकर्रमा और अर्शे मुअल्ला से भी अफ़ज़ल है
91:-आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के रौज़ए मुबारक पर एक फरिश्ता मुअक्किल है जो आप की उम्मत के दरूद आप को पहोँचाता है जैसा कि इमाम अहमद व निसाइ की रिवायत में है -जिस वक़्त कोई शख्स आप पर दरूद भेजता है वह फरिश्ता अर्ज़ करता है कि या मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ! इस वक़्त फुलाँ बिन फुलाँ आप पर दरूद भेजता है- हाकिम की रिवायत में है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि अल्लाह के फ़रिश्ते हैं जो ज़मीन में गश्त करते हैं -वह मेरी उम्मत का सलाम मुझे पहोँचाते हैं -उस के बावजूद आप खुद भी हर दरूद ख्वाँ का दरूद सुनते और जवाब मरहमत फरमाते हैं
92:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर हर रोज़ सुबह व शाम आप की उम्मत के आमाल पेश किये जाते हैं .नेक अअमाल पर आप अल्लाह का शुक्र बजा लाते हैं और बुरे आमाल के लिये बख्शिश तलब फरमाते हैं .हज़रत अब्दुल्लाह बिन मुबारक रदियल्लाहु तआला अन्हु ने हज़रत सईद बिन मुसय्यिब रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत की कि कोई रोज़ ऐसा नहीं मगर यह कि सुबह शाम उम्मत के आमाल नबी (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) पर पेश किये जाते हैं पस आप उन की पेशानियों से और उन के आमाल से पहचानते हैं
93;- आँहज़रत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम सब से पहले क़ब्र मुबारक से निकलेंगे -आप की तशरीफ आवरी इस हालत में होगी कि आप बुराक़ पर सवार होंगे और सत्तर हज़ार फ़रिश्ते हमरिकाब होंगे -हज़रत कअब अहबार रदियल्लाहु अन्हु की रिवायत में है कि हर रोज़ सुबह को सत्तर हज़ार फ़रिश्ते आसमान से उतर कर हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की क़ब्र मुबारक को घेर लेते हैं और अपने बाजू हिलाते हैं (और आप पर दरूद भेजते हैं ) इसी तरह शाम के वक़्त वह आसमान पर चले जाते हैं -और सत्तर हज़ार और हाज़िर होते हैं शाम के वक़्त - यहाँ तक कि जब आप क़ब्र शरीफ से निकलेंगे तो सत्तर हज़ार फ़रिश्ते आप के साथ होंगे मोक़िफ़ में आप को बहिश्त के हुल्लों की निहायत नफीस खिलअत अता होगी -
94:- आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मिम्बर मनीफ और क़ब्र मुबारक के माबीन बहिश्त के बागात में से एक बाग़ है
95:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को क़यामत के दिन (महमूद) अता होगा . जिस से मुराद बकौल मशहूर मुक़ामे शफ़ाअत है
96:- क़यामत के दिन अहले मोक़िफ़ तौल वकूफ के सबब से घबरा जाएंगे और बग़रज़ शफ़ाअत दिगर अंबिया ए किराम अलैहिमुस्सलाम के पास यके बाद दिग़रे जाएंगे -और आखिर कार हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर होंगे - आप को अहले मोक़िफ़ में फसले क़ज़ा के लिये शफ़ाअते उज्मा अता होगी .और एक जमाअत के हक में बग़ैर हिसाब जन्नत में दाखिल किये जाने के लिये और दूसरी जमाअत के रफ़अ दरजात के लिये शफ़ाअत की इजाज़त हो जाएगी -इस तरह सत्तर हज़ार बहिश्त में बे हिसाब दाखिल होंगे और सत्तर हज़ार के साथ और बहोत से बे हिसाब बहिश्त में जाएंगे .उस के इलावह आप को अपनी उम्मत के लिये और कइ क़िस्म की शफ़ाअत की इजाज़त हासिल होगी
97:- हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को हौज़े कौसर अता होगी .हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का मिम्बर मनीफ आप के हौज पर होगा
98:- क़यामत के दिन हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की उम्मत पहले सब पैगम्बरों की उम्मतों से ज़्यादा होगी -कुल अहले बहिश्त की दो तिहाई आप ही की उम्मत होगी .क़यामत के दिन हर एक का नसब व सबब मुनक़तअ होगा (यानी सूद मंद न होगा ) मगर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का नसब व सबब मुनक़तअ न होगा
99:- क़यामत के दिन लिवाए हम्द हुजूर
सल्लल्लाहु तआला अलैहि वस्ललम के दस्ते मुबारक में होगा -और तमाम अंबिया अलैहिमुस्सलाम इस झंडे तले होंगे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वस्ललम अपनी उम्मत समेत सब से पहले पुलसिरात से गुजरेंगे
100:- हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वस्ललम सब से पहले बहिश्त का दरवाज़ा खटखटायेंगे -खाजिने जन्नत पूछे गा कि कौन हैं ? आप फरमायेंगे कि मैं मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हूँ -वह अर्ज़ करेगा कि मैं उठ कर खोलता हूँ मैं आप से पहले किसी के लिये उठा और न आप के बाद किसी के लिये उठूंगा फिर आप सब से पहले बहिश्त में दाखिल होंगे
आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वस्ललम को वसीला अता होगा जो जन्नत में अअला दरजा है
जन्नत में सिवाए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वस्ललम की किताब (कुरआने करीम )के कोई और किताब न पढ़ी जाएगी -और न सिवाए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वस्ललम की ज़बान के किसी और ज़बान में कोई तकल्लुम करेगा
खात्मा
अल्हम्दुलिल्लाह रिसाला हाज़ा सिर्फ एक नशिष्त में बादे नमाज़े ईशा मसाईले ज़रूरियह और महमानों की जियाफत के बाद रात 12 बजे खतम हुआ
शबे जुमेरात 16 अक्टूबर 1997
मदीने का भिकारी अल फ़कीरूल क़ादरी अबुस्सालेह मुहम्मद फ़ैज़ अहमद अवेसी रज़वी ग़फ़रलाहू भावलपूर पाकिस्तान
उर्दू से हिंदी :- 14 सितंबर 2021 ईस्वी - बरोज़ मंगल 05 सफर 1443 हिजरी
मुहम्मद अब्दुर रहीम खान क़ादरी रज़वी.मुक़ाम व पोस्ट जमदा शाही ज़िला बस्ती उत्तर प्रदेश इंडिया 272002
खतीब व इमाम अहमदी जामा मस्जिद लहाडपुर खंडवा प्रदेश इंडिया 7860762579
शअबुल ईमान का सलीस हिंदी तर्जुमा
*शअबुल ईमान*
शअबुल ईमान
का सलीस हिंदी तर्जुमा
ईमान की शाखें
ईमान और उस की शाखों पर साठ अहादीसे करीमा
मुसन्निफ
इमाम हाफिज़ शैख़ इमामुद्दीन इब्ने कसीर अशअरी शाफ़ई दमिश्की
(702-774 हिजरी.1301-1373ईस्वी)
तहक़ीक़ व तर्जुमा (उर्दू)
अल्लामा मौलाना डाक्टर हामिद अलीमी
तर्जुमा उर्दू से हिंदी
मुहम्मद अब्दुर रहीम खान कादरी रज़वी
जमदा शाही बस्ती यू पी खतीब व इमाम जामा मस्जिद राजगढ़ ज़िला धार मध्य प्रदेश इंडिया 7860762579
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
तमाम तारीफ अल्लाह तआला के लिये जो तमाम जहानों का परवर दिगार है ऐसी पाकीज़ा व मुबारक तारीफ जो क़यामत तक के लिये हो. मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई मुस्तहिक़े इबादत नहीं वह अकेला है. उस का कोई शरीक नहीं. अव्वलीन व आखिरीन का माबूद है.और मैं गवाही देता हूँ कि सय्यिदिना मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उस के बंदे.उस के रसूल.उस के हबीब और खातिमुल अंबिया वल मुरसलीन हैं.अल्लाह ला इन पर इन के असहाब.अज़वाज और जुर्रियत तमाम पर रहमत भेजे
अम्मा बाद
अल्लाह तआला का कुरआने मजीद में इरशाद है
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ ادْخُلُواْ فِي السِّلْمِ كَآفَّةً
"ऐ ईमान वालो इस्लाम में पूरे दाखिल हो जाओ"
(सूरः बकरा आयत 208)
मुफस्सिरीन का इस लफ्ज़ "काफ्फह* के माना में इख्तिलाफ है.अक़वाल को जेल में जिक्र किया जाता है
(01) उस का माना यह है कि तुम सब के सब इस्लाम में दाखिल होजाओ
(02) उस का माना यह है कि तुम सब इस्लाम में अपने गैरों से बचते हुए दाखिल हो जाओ और किसी को इस्लाम में दाखिल होने से मना भी न करो.लिहाज़ा इस क़ौल पर लफ्ज़ " काफ्फह " लफ्ज़ इदखुलू* में जमीर का हाल होगा
(03) उस का माना यह है कि पूरे इस्लाम में दाखिल हो जाओ यानी :उस के तमाम अह्कामात को थाम लो.यही सही तरीन क़ौल है (तफ्सीरे इब्ने कसीर. जिल्द 01 सफा 566)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है :- ईमान की सत्तर (70) से कुछ ज़ाईद शाखें हैं.सब से आअला "लाइला ह इल्लल्लाह" कहना सब से अदना रास्ते से तकलीफ दह चीज़ को हटाना और हया भी ईमान की एक शाख है (इमाम बुखारी व मुस्लिम ने इसे हज़रत अबू हुरैरा से रिवायत किया है)
इन शाखों की तादाद के बारे में अहादीस व आसार बहोत. सी मरवी हैं.हम उन तमाम का ज़िक्र करेंगे और उन में हर एक की सिहत व जुअफ़ के साथ उस के रवायत करने वाले के बारे में भी बताएंगे.अल्लाह तआला की तरफ से ही तौफीक का मिलना है और उसी पर भरोसा किया जाता है.नेकी की ताकत और बदी से बचने की कुव्वत भी अल्लाह तआला की तरफ से ही है.जो गालिब और हिकमत वाला है
हदीस की तशरीह
हम कहते हैं कि मज़कूरह हदीस तीन शाखों पर मुश्तमिल है.
पहली:- यह गवाही देना कि अल्लाह तआला के सिवा कोई मुस्तहिक़े इबादत नहीं -
दूसरी:- रास्ता से तकलीफ दह चीज़ हटाना
तीसरी :- हया
बक़िया शाखों का बयान
(4 से 8 तक का बयान)
चौथी:-नमाज़ पांचवीं:- ज़कात। छटवीं :- पांचों वक़्त की नमाज़ की अदायगी सातवीं:- रोज़ा।
आठवीं:- हज
चुनांचे हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रदियल्लाहु अन्हा से रिवायत है फरमाया
"कबीला अब्दुल कैस का वफद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर हुआ.उन्हों ने अर्ज़ की : " ऐ अल्लाह के रसूल ! हम रबीआ क़बीले वाले हैं. हमारे और आप के दरमियान कुफ्फारे मुजिर का क़बीला हाईल है.हम आप की खिदमत में सिर्फ हुरमत वाले महीने में आ सकते हैं लिहाजा हुजूर हमें उस चीज़ का हुक्म फरमा दें जिस पर हम अमल करें और अपने पीछे वालों को उस की दावत दें. "हुजूर अलैहिस्सलातो वस्सलाम ने फरमाया.में तुम्हें चार चीजों का हुकुम देता हूँ और चार चीजों से मना मना करता हूँ. तुम्हें ईमान का हुकुम देता हूँ-फिर हुजूर ने उन्हें ईमान की तशरीह बताई कि ईमान है कि गवाही देना है कि अल्लाह के सिवा कोई मुस्तहिक़े इबादत नहीं और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अल्लाह के रसूल हैं. नमाज़ क़ाईम करना. ज़कात देना और माले गनीमत से. पांचों नमाज़ की अदायगी करना" इमाम बुखारी व मुस्लिम ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल बुखारी हदीस 53 सहीहुल मुस्लिम हदीस 17)
ईमान बिल्लाह के इलावह सात शाखों का बयान
(09 से 15 का बयान)
नौवें:- अल्लाह तआला के फरिश्तों पर ईमान लाना
दसवें:-अल्लाह तआला की किताबों पर ईमान लाना
ग्यारहवें:-अल्लाह तआला के तमाम रसूलों पर ईमान लाना
बारहवें:-मरने के बाद दोबारा उठाए जाने पर ईमान लाना
तेरहवें :- जन्नत
चौदहवें:- दोज़ख
पन्द्रहवें:- अच्छी व बुरी तकदीर पर ईमान लाना
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है फरमाया
"एक शख्स रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर हुआ और अर्ज़ की " ऐ अल्लाह के रसूल ! ईमान क्या है ? फरमाया : तू ईमान लाए अल्लाह तआला पर.उस के फरिश्तों पर.उस की किताबों पर. उस के रसूलों पर.मरने के बाद दोबारा उठाए जाने पर. जन्नत व दोज़ख पर और अच्छी और बुरी तक़दीर पर. इमाम बुखारी व मुस्लिम ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल बुखारी हदीस 50 सहीहुल मुस्लिम हदीस 08-10)
सोलहवीं और सत्तरहवीं शाख
सोलहवीं :-जिहाद
सत्तरहवीं :- वालिदैन से हुस्ने सुलूक
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि मैं ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा :"कौन सा अमल बेहतर है " फरमाया :- "नमाज़ को उस के वक़्त में पढ़ना- मैं ने अर्ज़ की :फिर कौन सा? फरमाया " वालिदैन के साथ हुस्ने सुलूक" मैं ने अर्ज़ की"फिर कौन सा ? फरमाया "अल्लाह तआला की राह में जिहाद करना" हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझ से यह चीजें बयान कीं.अगर मैं ज्यादा पूछता तो हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ज़्यादा इरशाद फरमाते."इमाम बुखारी व मुस्लिम ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल बुखारी हदीस 527.सहीहुल मुस्लिम हदीस 85)
अट्ठारहवीं. उन्नीसवीं और बीसवीं शाख
अट्ठारहवीं :-अल्लाह तआला और उस का रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सब से ज़्यादा प्यारे हों -
उन्नीसवीं :- सिर्फ अल्लाह तआला के लिये मुहब्बत करना
बीसवीं:-इस्लाम में आने के बाद कुफ्र में लौटने को बुरा जानना-
"जिस में तीन खस्लतें हों वह ईमान की लज्जत पालेगा
(01) उस के नज़दीक अल्लाह व रसूल तमाम मासिवा से ज़्यादा प्यारे हों (02) और यह कि वह जिस शख्स से भी मुहब्बत करे सिर्फ अल्लाह तआला के लिये मुहब्बत करे (03) और यह कि उस के नज़दीक कुफ्र में लौटना ऐसा ना पसंदीदा हो जैसे आग में डाला जाना.ना पसंदीदा हो. इमाम बुखारी ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल बुखारी हदीस 16-सहीहुल मुस्लिम हदीस 43)
इक्कीसवीं शाख: अंसार से मुहब्बत
हज़रत अनस रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया " ईमान की निशानी अंसार से मुहब्बत करना और निफाक़ की निशानी अंसार से बुग्ज़ रखना है. इमाम बुखारी व मुस्लिम ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल बुखारी हदीस 17-सहीहुल मुस्लिम हदीस 74)
बाईसवीं शाख: हज़रत अली कर्रमल्लाहु
वजहहु से मुहब्बत
हज़रत ज़र बिन हबीश रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु ने फरमाया
"उस जात की क़सम जिस ने दाने को चीरा और हर जान को पैदा किया ! बे शक नबिय्ये उम्मी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने (मुझ से) यह अहद फरमाया कि तुझ से मुहब्बत न करेगा मगर मोमिन और बुग्ज न रक्खेगा मगर मुनाफिक़ ! इमाम मुस्लिम ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल मुस्लिम हदीस 78)
तेविसवीं शाख
हज़रत अनस रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबिय्ये करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
" तुम में कोई भी उस वक़्त (कामिल) मोमिन नहीं हो सकता जब तक वह अपने भाई के लिये भी वही पसंद न करे जो अपने लिये पसंद करता है " इमाम बुखारी व मुस्लिम ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल बुखारी हदीस 13-सहीहुल मुस्लिम हदीस 45)
चौबिसवीं.पचीसवीं और छब्बीसवीं शाख
हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहु अन्हु से रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबिय्ये करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
"जो अल्लाह तआला और रोज़े आखि़रत पर ईमान रखता है वह अपने पड़ोसी को तकलीफ न दे.और जो अल्लाह तआला और रोज़े आखि़रत पर ईमान रखता है वह अपने मेहमान की इज़्ज़त करे.और जो अल्लाह तआला और रोज़े आखि़रत पर ईमान पर ईमान रखता है वह अच्छी बात कहे या खामोश रहे :- ईमान बुखारी व मुस्लिम ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल बुखारी हदीस 6018.सहीहुल मुस्लिम हदीस 47)
सत्ताईसवीं शाख: सलाम को फैलाना
हज़रत अबू सालेह हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
" उस ज़ात की क़सम जिस के क़बज़े में मेरी जान है तुम जन्नत में दाखिल न होगे हतता कि मोमिन बन जाओ और मोमिन न बनोगे हतता कि आपस में मुहब्बत करो-क्या मैं तुम्हें उस पर रहबरी न करूं कि जब तुम वह करलो तो आपस में मुहब्बत करने लगो.अपने दरमियान सलाम फैलाओ" इमाम मुस्लिम ने इसे रिवायत किया है (सही मुस्लिम हदीस 54 मुसन्निफ इब्ने अबी शैबा हदीस 25742)
अट्ठाइसवीं और उनतीसवीं शाख
हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबिय्ये करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
*जो ईमान और ईख्लास से रमज़ान के रोज़े रखे उस के गुज़िश्ता गुनाह बख्श दिये जाएंगे.और जो रमज़ान में ईमान व ईख्लास से शबे क़द्र में इबादत करे तो उस के गुज़िश्ता गुनाह बख्श दिये जायेंगे*इमाम बुखारी ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल बुखारी हदीस 2014-सहीहुल मुस्लिम हदीस 670)
तीसवीं शाख
हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
"जो कोई मुसलमान के जनाज़े के साथ ईमान और ब निय्यत सवाब जाए और उस पर नमाज़ पढ़े फिर उसे क़ब्र में दफनाने तक इंतिज़ार करे.तो उस के लिये दो कीरात अज्र है.एक क़ीरात मिसले उहद है.और जो उस पर नमाज़ पढ़ कर (दफन से पहले ) लौट जाए उस के लिये एक क़ीरात अज्र है.इमाम बुखारी ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल बुखारी हदीस 47सहीहुल मुस्लिम हदीस 945)
इकतीसवीं शाख
शअबुल ईमान में इकतीसवीं शाख का ज़िक्र नहीं है.मुमकिन है कि वह " जनाज़े पर नमाज़ पढ़ना हो " वल्लाहू अअलमु बिस्सवाब.(यह मुहक्किके किताब की राय है)
बत्तीसवीं शाख
:अल्लाह तआला की राह में निकलना
हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
"अल्लाह तआला उस का ज़ामिन हो चुका.जो उस की राह में निकला (फरमाता है) यह सिर्फ मुझ पर ईमान लाने और मेरे रसूल की तस्दीक़ करने के लिये घर से निकला है अल खैर
(मुकम्मल हदीस के अल्फ़ाज़ यह हैं: तो अल्लाह तआला उस के लिये इस बात का ज़ामिन है कि (अगर वह मर गया तो ) उसे जन्नत में दाखिल करेगा या अपने उस घर की तरफ जिस से वह निकला है. उस अज्र और गनीमत के साथ लौटाएगा जो उस ने हासिल किया है) इमाम बुखारी व मुस्लिम ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल बुखारी हदीस 36-सहीहुल मुस्लिम हदीस 1876)
तैंतीसवीं शाख
हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि एक शख्स ने अर्ज़ की :
" ऐ अल्लाह के रसूल ! हम में से कोई अपने दिल में ऐसे ख्यालात महसूस करता है.जबान पर जिसे न लाना सारी ज़मीन की दौलत से बेहतर समझता है."यह तो सरा सर ईमान है " इमाम मुस्लिम ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल मुस्लिम हदीस 132)
हज़रत इब्ने मसऊद रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उस शख्स ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में वसवसे की शिकायत की.हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :यह खुला हुआ ईमान है (सहीहुल मुस्लिम हदीस 133)
चौतिसवीं शाख
हज़रत अबू अमामा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया
"बे शक पुराने कपड़े पहनना ईमान से है (सुनन अबू दाऊद हदीस 4161- सुनन इब्ने माजा हदीस 4118)
पैंतीसवीं शाख
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
" जिसे उस की नेकी खुश करे और उस की बुराई ग़मगीन करे तो वह मोमिन है "(मुसतदरक अल हाकिम हदीस 35)
छत्तिसवीं शाख
हज़रत अनस रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
" मोमिनों में कामिल ईमान वाला वह है जिस के इखलाक़ अच्छे हों और बे शक हुस्ने इख्लाक़ रोज़े और नमाज़ के दर्जे पर है " (मसनद अबू यअला हदीस 4115)
सैंतीसवीं शाख
हज़रत अनस रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमें वाज़ करते तो फरमाया करते :
"जो अमीन नहीं उस का ईमान नहीं.जो वअदे का पाबंद नहीं उस का दीन नहीं (मसनद इमाम अहमद बिन हम्बल हदीस 12383)
अड़तिसवीं शाख
हज़रत उमरू बिन शुएब अपने वालिद से वह अपने दादा से रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
" मुझे सारी मख्लूक़ में प्यारी ईमान वाली वह क़ौम है जो मेरे बाद होगी वह सहीफे पायेंगे जिन में वह किताब होगी.वह किताब की हर चीज़ पर ईमान लायेंगे " (तफसीरे इब्ने कसीर 1.सफा 167)
यह हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहु अन्हु से मरवी है
उन्तालिसवीं शाख
हज़रत उबैद बिन उमैर से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा गया :
"इस्लाम किया है ?" फरमाया "खाना खिलाना"पूछा गया: तो ईमान किया है ?ए अल्लाह के रसूल ! फरमाया:" सखावत और सब्र" ज़हरी ने अब्दुल्लाह बिन उबैद बिन उमैर से और उन्होंने अपने वालिद से इसे रिवायत किया किया है (तारीखुल कबीर लिल बुखारी हदीस 41.5.25.26)
चालीस्वीं शाख
हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
"अल्लाह की क़सम ! मोमिन नहीं होता ! अल्लाह की क़सम !मोमिन नहीं होता.अल्लाह की क़सम ! मोमिन नहीं होता ! सहाबा ने अर्ज़ की :कौन ? फरमाया :" वह जिस का पड़ोसी उस की शरारतों से अमन में न हो ! "इमाम बुखारी ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल बुखारी हदीस 6061-सहीहुल मुस्लिम हदीस 46)
इकतालीसवीं शाख
इमाम बग़वी हज़रत अबू ऊमामा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं कि नबिय्ये करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
" हया और खामोशी ईमान की दो शाखें हैं और फहश गोई और ज़्यादा बोलना निफाक़ की दो शाखें हैं"
(शरहूस्सून्नह हदीस 3384-मसनद इमाम अहमद हम्बल हदीस 22312-जामेअ तिरमिज़ी हदीस 2027)
बियालिसवीं शाख
i 2ईद रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं बिन कि . रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
"जब तुम किसी शख्स को मस्जिद आता जाता देखो तो उस के ईमान की गवाही दे दो.अल्लाह तआला का इरशाद है
إِنَّمَا يَعْمُرُ مَسَـٰجِدَ ٱللَّهِ مَنْ ءَامَنَ بِٱللَّهِ
وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ
"" अल्लाह की मस्जिदें वही आबाद करते हैं जो अल्लाह और क़यामत पर ईमान लाते हैं (सूरए तौबा 09-18)
(मसनद इमाम अहमद बिन हम्बल हदीस 11651- जामेए तिरमिज़ी हदीस 2617)
तैंतालिसवीं शाख
हज़रत नोमान बिन बशीर रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया ;
"मोमिनीन की आपस में मुहब्बत और रहमत की मिसाल एक जिस्म की तरह है.जब एक अज्वो (अंग) बीमार हो जाए तो सारे जिस्म के आज़ा बे ख्वाबी और बुखार की तरफ एक दूसरे को बुलाते हैं .इमाम मुस्लीम ने इसे रिवायत किया है (सहीहूल मुस्लिम 2586-सहीहुल बुखारी 6011)
चव्वालिसवीं शाख
हज़रत अबू मूसा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
" मोमिन.मोमिन के लिये बुनियाद की तरह हैं.वह एक दूसरे के साथ जुड़ कर मज़बूत होते हैं (सहीहुल बुखारी हदीस 481-सहीहुल मुस्लिम 2585)
पैंतालिसवीं शाख
हज़रत ज़ुबैर बिन.हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं कि नबिय्ये करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया
मोमिन उलफत करता है और उस में खैर नहीं जो न उलफत करे न उस से उलफ़त की जाए.(मसनद इमाम अहमद बिन हम्बल हदीस 9198-अल कामिललिइब्ने अदी 2-685)
छियालिसवीं शाख
हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबिय्ये करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
"बंदे के कामिल ईमान में से यह भी है कि वह अपनी हर बात में इस्तेस्ना करे "
(मुअजम औसत लिलतिबरानी हदीस 7752)
नोट:-यह हदीस साबित नहीं.कियोँकि उस की सनद दाऊद बिन मुहबिर अज़ मुआक बिन अबाद अज़ अब्दुल्लाह बिन सईद मक़बरी अज़ अबू हुरैरा है. और यह सनद बिल इत्तेफाक "मतरूह" है- (मुमकिन है उस से मुराद सबूते सिहत न हो.बल्कि ग़ैर सहीह .हसन लिज्जात या लिगैरिही हो या फिर ज़ईफ़ हो.कियोँकि मुसन्निफ का इसे किताब में ज़िक्र करना इस के सबूत की दलील है)
सैंतालीसवीं शाख
मुहम्मद बिन खालिद.हज़रत अब्दुल्लाह रदियल्लाहु अन्हु रिवायत करते हैं कि नबिय्ये करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
"सब्र.निस्फ ईमान है और यक़ीन पूरा ईमान है
(शअबुल ईमान लिल बेहक़ी हदीस 9265)
अड़तालीसवीं शाख
अबू क़लाबा जरमी एक मुसलमान से वह अपने से रावी की नबिय्ये करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :" इस्लाम ले आओ सलामत रहोगे."अर्ज़ की:" ऐ अल्लाह के रसूल ! इस्लाम किया है ?फरमाया ."तू अल्लाह के सामने सरे तस्लीम खम कर ले और मुसलमान तेरी ज़बान और हाथ से महफूज़ रहें."अर्ज़ की ?कौन सा इस्लाम बेहतर है ? फरमाया "ईमान " अर्ज़ की : "ईमान क्या है ? फरमाया : यह कि तू अल्लाह पर.उस के फरिश्तों पर. उस की किताबों पर .उस के रसूलों पर और मरने के बाद दो बारा उठाए जाने पर ईमान लाए" अर्ज़ की :"कौन सा अमल बेहतर है ? फरमाया "हिजरत-अर्ज़ की.हिजरत किया है? फरमाया :" यह कि तू बुराई को छोड़ दे" रावी कहते हैं कि मैं ने अर्ज़ की :"कौन हिजरत बेहतर है ? फरमाया :"जिहाद .मैं ने अर्ज़ की :जिहाद किया है ? फरमाया :"यह की तुम जब कुफ्फार से मिलो तो उन से जिहाद करो.न खियानत करो और न बुज़दिल बनो " फिर तीन मरतबा यह फरमाया कि दो अमल ऐसे हैं जो सब आमाल से बेहतर और कामिल हैं हज्जे मबरूर या उमरा (मुसन्निफ अब्दुर्रज्जाक हदीस 20107/मसनद इमाम अहमद बिन हम्बल हदीस हदीस 17027)
उँचास्वीं शाख
इमाम बग़वी हज़रत अनस रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
"मोमिन की मिसाल बाली की तरह है कि वह कभी झुक जाती है और कभी सीधी रहती है (मसनद अबू यअला हदीस 3272-शरह उसूल एइतिकाद अहले सुन्नत वल जमाअत हदीस 1684)
पचासवीं शाख
हज़रत आदी बिन साबित.हज़रत ज़र बिन हबीश रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं.कि हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु ने फरमाया
" उस ज़ात की क़सम जिस ने दाने को चीरा और हर जान को पैदा किया ! बे शक नबी उम्मी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह अहद फरमाया कि तुझ से मुहब्बत न करेगा मगर मोमिन और बुग्ज न रखेगा मगर मुनाफिक."इमाम मुस्लिम ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल मुस्लिम हदीस 78)
इक्कावनवीं शाख
नईम बिन हम्माद.हज़रत अबादह बिन सामित रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
"बे शक आदमी का बेहतर ईमान यह है कि उसे इल्म हो कि अल्लाह तआला उस के साथ है वह जहाँ कहीं हो (मुअजम औसत लिल तिबरानी हदीस 8791)
. बाँनवीं शाख
हज़रत अब्बास बिन मुत्तलिब रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि मैं ने अर्ज़ की
" ऐ अल्लाह के रसूल ! हम आप के कुछ सहाबा के चेहरों में कीना देखते हैं.उन वाक़िआत की वजह से जिन के सबब हम उन से कीना में मुब्तिला हुए.तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :उन्हों ने कर लिया ? अर्ज़ की :"हाँ? फरमाया " वह मोमिन नहीं होंगे या उन्हें ईमान की मुहब्बत नहीं मिलेगी जब तक वह तुम से अल्लाह तआला और उस के रसूल के लिये मुहब्बत न करें.किया वह मेरी शफ़ाअत की उम्मीद करते हैं और बनी अब्दुल मुत्तलिब उस की उम्मीद नहीं करते " (शरह उसूले एतिकाद अहले सुन्नत वल जमाअत हदीस 1687)
तिरपन से सत्तावन 53-से 57 तक की शाखें
अंसार की मुहब्बत.नेकी का हुक्म और बुराई से मना करना. मुसलमानों को सलाम करना जब तुम उन के पास जाओ. लोगों को सलाम करना जब उन के पास से गुजरो. यह पाँच शाखें हैं हैं जिन में से हरएक बारे में सहीह हदीस मरवी है
(अट्ठावन से साठ तक) तीन मज़ीद शाखें
हज़रत अनस बिन मालिक रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
"जिस में तीन खस्लतें हों वह ईमान की लज्जत पालेगा (01) उस के नज़दीक अल्लाह व रसूल तमाम मा सिवा से ज़ियादा पियारे हों (02) और यह कि वह जी शख्स से भी मुहब्बत करे सिर्फ अल्लाह तआला के लिये मुहब्बत करे (03) और यह कि उस के नज़दीक कुफ्र में लौटना ऐसा ना पसंदीदा हो जैसे आग में डाला जाना.ना पसंदीदा हो " इमाम बुखारी ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल बुखारी हदीस 16-सहीहुल मुस्लिम हदीस 16 )
इकसठवीं शाख
हज़रत अनस रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबिय्ये करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
"तुम में कोई भी उस वक़्त तक (कामिल ) मोमिन नहीं हो सकता है जब तक वह लोगों के लिये भी वही पसंद न करे जो अपने लिये पसंद करता है और जब तक वह आदमी से सिर्फ अल्लाह के लिये मुहब्बत न करे " (मस नद इमाम अहमद हम्बल हदीस 13875)
बासठवीं शाख
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रदियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
"सफाई निस्फ (आधा) ईमान है. इमाम मुस्लिम ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल मुस्लिम हदीस 223)
तिरसठवीं शाख
हज़रत अनस रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
" बंदे का ईमान उस वक़्त तक कामिल नहीं होता जब तक उस के इखलाक़ अच्छे न हो जाएं और उस का गुस्सा कम न हो जाए "इमाम तिबरानी ने बरवायत अबू मौमूदूद अज़ अबू हाजिम अज़ अनस से रिवायत किया है (शरह उसूले एतिकाद अहले सुन्नत वल जमाअत हदीस 1692)
चौंसठवीं शाख
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
" वह मोमिन जो लोगों में मिल जुल कर रहे और उन की तकलीफ पर सब्र करे.उस से अफ़ज़ल है.जो न उन में मिल जुल कर रहे और न उन की ईज़ा पर सब्र करे.
(शरह उसूले एतिकाद अहले सुन्नत वल जमाअत हदीस 1693) मसनद इमाम अहमद हम्बल हदीस 15022)(अल अदब अल मफ़रद लिल बुखारी हदीस 388) जामेअ तिरमिज़ी हदीस 2507) सुनन इब्ने माजा हदीस 4032)
शाख
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रदियल्लाहु अन्हा ने फरमाया :
"बंदा या आदमी ईमान की हक़ीक़त को नहीं पहोंचता जब तक लोगों को उन के दीन में देख कर अहमकों की तरह न समझे " उस की असनाद हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रदियल्लाहु अन्हा से सहीह है (अल ज़हद लइब्ने मुबारक हदीस 296- अन अब्दुल्लाह बिन उमर रदियल्लाहु अनहुमा )
छियासठवीं शाख
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रदियल्लाहु अन्हु ने फरमाया :
"बे शक अल्लाह तआला ने तुम्हारे इख्लाक तक्सीम फरमादिये हैं. जैसा कि तुम्हारे दरमियान तुम्हारी रोज़ी बांट दी है. और अल्लाह तआला दुनिया तो उसे भी देता है जिस से मुहब्बत करता है और जिसे ना पसंद फरमाता है.मगर ईमान उस को देता है जिस से मुहब्बत करता है .तो जो कोई उस रात के क़याम से आजिज़ हो. उस माल के खर्च करने से आजिज़ हो. और दुश्मन का मुक़ाबला करने से कमज़ोर हो उसे " सुबहानल्लाह वलहमदुलिल्लाह " की कसरत करनी चाहिए कियोँकि यह अल्लाह तआला के नज़दीक सोने और चांदी के पहाड़ से बेहतर है (अल अदबुल मफ़रद लिल बुखारी हदीस 275)
चार दिगर शाखें (67-70 तक)
हज़रत अबू दरदा रदियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं :
"ईमान की चोटी चार चीजें हैं.फैसला करते वक़्त सब्र.तक़दीर पर रज़ामंदी. तवक्कल के लिये इख्लास. और परवरदिगार के हुजूर सुपुर्दगी (अल जुहद बिन मुबारक हदीस 123)शअबुल ईमान लिल बे हकी हदीस 198)हूलयतुल औलिया:1-216)शरह उसूल एतिकाद अहले सुन्नत वल जमाअत हदीस हदीस 1238)
इकहत्तरवीं और बहत्तरवीं शाख
इब्नेअबी हातिम.हज़रत अमार बिन यासिर रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
" जिस में तीन खस्लतें (आदत) हों वह ईमान की लज्जत पालेगा-तंग्दस्ती में खर्च करना.आलम में सलाम फैलाना.और खुद लोगों से इंसाफ करना."इमामूल काई ने कहा :यह मरफूअ नहीं (शरह उसूल एतिकाद अहले सुन्नत वल जमाअत 05:1004)
यानी :सहीह यह है कि हदीस मौकूफ है (मुसन्निफ अब्दुर्रज्जाक हदीस 19439)
.. तिहत्तरवीं शाख
अल्लाह तआला की राह में घोड़ा बांधना
हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि :
"जिस ने अल्लाह की राह में घोड़ा बांधा.अल्लाह तआला पर ईमान लाते हुए और उस के वअदों की तस्दीक करते हुए.तो उस का पेट भरना.उस की लीद और पेशाब.क़यामत के दिन उस शख्स की मीजान में नेकियां होगा " इमाम बुखारी ने इसे रिवायत किया है (सहीहुल बुखारी हदीस 2853)
बिहम्दिही तआला यह रिसाला अल्लाह तआला की मदद और उस की उमदा तौफीक से मुकम्मल हुआ -
अरबी से उर्दू
तर्जुमा व तखरीज का काम :- 26 मई 2013 -15 रजब 1434 हिजरी को मुकम्मल हुआ
उर्दू से हिंदी
06 सितंबर 2021 पीर (सोमवार) 26 मुहर्रमुल हराम 1443 हिजरी को मुकम्मल हुआ
*मुहम्मद अब्दुर रहीम खान क़ादरी रजवी*
*जमदा शाही ज़िला बस्ती उत्तर प्रदेश इंडिया पिन कोड 272002*
*खतीब व इमाम अहमदी जामा मस्जिद लहाड़पूर माल ज़िला खंडवा एम पी नियर खिरकिया रेलवे स्टेशन*
*मोबाइल 7860762570*

